दोस्त ही नहीं, हर एक दुश्मन भी ज़रूरी होता है!

एक पॉप्युलर टेलीकॉम कंपनी के एक विज्ञापन में बताया गया था कि ‘हर एक दोस्त ज़रूरी होता है’. पर हमारा मानना है कि ज़िंदगी में दोस्त की ही तरह दुश्मन भी ज़रूरी होते हैं, बस आपको सीखनेवाला नज़रिया बरक़रार रखना होगा. मानव-जाति का अस्तित्व उसके शत्रुओं यानी दुश्मनों जितना ही पुराना है और भविष्य भी शत्रुओं के बराबर ही होगा. हम मानवों को शुरू से ही शत्रुओं से बचने का तरीक़ा सिखाया जाता है, उनसे होने वाले नुक़सान बताए जाते हैं और उन्हें नष्ट करने के तरीक़े बताए जाते हैं लेकिन उनसे हमें क्या क्या लाभ होते हैं, यह कोई नहीं बताता.

सबसे पहला लाभ तो शत्रुओं का यह होता है कि वह हमें सतर्क रखता है. शत्रुओं के बिना हम लापरवाह हो जाते हैं और फिर कोई अचानक से आई छोटी सी आपदा भी हमें ख़त्म कर सकती है.

दूसरा लाभ हमें शत्रुओं से यह होता है कि वे हमें हमारी कमज़ोरियों पर ग़ौर करना सिखाते हैं.  हम कहां मज़बूत हैं और कहां हम कमज़ोर हैं, इस बात का ज्ञान शत्रु की अनुपस्थिति के बिना नहीं हो सकता. शत्रु की अनुपस्थिति में कमज़ोरियों पर ग़ौर करना वैसे भी लोगों को औचित्यहीन लगता है.

तीसरा लाभ शत्रु से हमें यह होता है कि वह हमें संगठित करता है. एकता शत्रु के बिना संभव नहीं है और एकता का शत्रु के बिना कुछ औचित्य भी नहीं. शत्रु लोगों को इकट्ठा करने और उनके पैरों को मज़बूती से जमाने वाला गुरुत्वाकर्षण बल है. शत्रु से अच्छा एक करने वाला कोई अन्य कारक है ही नहीं इस ब्रह्मांड में. आज पूरी दुनिया एकता के सूत्र में बंध गई है, वजह है, कोरोना नामक वैश्विक शत्रु.

चौथा लाभ शत्रु से यह है कि वह हमें कई अन्य विकल्पों पर ध्यान दिलवाता है. शत्रु उत्पन्न होते ही हम कई विकल्पों पर सोचने लगते हैं और कई समस्याओं के कई हल हमारे मस्तिष्क में आने लगते हैं. शत्रु के बिना मनुष्य आदिकाल से अब तक एक ही पगडंडी पर चलता रहता.

पांचवां लाभ शत्रु से यह है कि वह हमें अमर बनाता है. किसी विनाशक शत्रु से मानवता को बचा लेने वाले नायक इतिहास में अमरत्व पा जाते हैं. शत्रु के बिना इतिहास कैसे लिखा जाता और फिर नायक और महानायकों को कौन याद रखता भला?

कैसे पाएं शत्रुओं से लाभ?
शत्रुओं से लाभ पाने से पहले शत्रुओं को जान लेना और समझ लेना भी ज़रूरी है. यदि आप शत्रु को पहचानने जितनी बुद्धि नहीं रखते तो फिर शत्रु से आपको लाभ मिल ही नहीं सकता. आपका हाल उस मछली की तरह होगा जो कांटे में फंसे चारे को शत्रु नहीं समझ पाती और हांडी में पकने चली जाती है. आप उस चिड़िया की तरह होंगे जो तंबू की अस्थिरता को शत्रु नहीं जानकर अपना घोंसला उस पर बनाकर अंडे दे देती है और दो दिन बाद सैनिक वह तंबू उखाड़कर कहीं और लगाने के लिए समेट लेते हैं. अपने वास्तविक शत्रुओं को पहचानना आज भी मनुष्यों का पहला कर्तव्य है. शत्रुओं को जाने बग़ैर दौड़ लगाने वाला उस अंधे बैल जैसा है जो हरी घास की ख़ुशबू की दिशा में तेज़ी से दौड़ लगाता है लेकिन उसे नहीं पता कि घास से पहले एक खाई भी है.