क्या कोरोना के बाद नारीवाद का भविष्य बदलनेवाला है?

वक़्त दोनों के लिए साथ-साथ शुरू हुआ था. ईश्वर ने उन्हें साथ-साथ दुनिया में उतारा. डार्विन के विकासवाद के अनुसार भी ये दोनों साथ-साथ विकास करते रहे, क्योंकि यदि विकास साथ- साथ नहीं होता तो ये दोनों ही विलुप्त हो जाते. दोनों एक-दूसरे के बिना कुछ भी नहीं हैं.


जब-जब वक़्त ने करवट बदली, स्त्री ने दुनिया को संभाला 

स्त्री-पुरुष साथ-साथ चलते रहे एक सफ़र पर. दुनिया ने कई करवटें ली लेकिन इन दोनों के क़दम वहीं के वहीं रहे-औरतों के क़दम मर्दों के पीछे. इंसानियत ने बहुत तरक़्क़ी की और ये दोनों इस तरक़्क़ी पर साथ-साथ इठलाते हैं, इतराते हैं. तरक़्क़ी के अपने सोपान पर इंसानियत ने एक करवट तब ली जब द्वितीय विश्वयुद्ध में अधिकांश पुरुष युद्धों में चले गए तब महिलाओं
को कई काम पुरुषों के भी करना पड़े जैसे-खेती बाड़ी, बागबानी, दुकानदारी, गाड़ी चलाना, लिखना, पड़ना, हिसाब करना और नौकरी भी करना.
द्वितीय विश्व युद्ध के कुछ सालों बाद गर्भनिरोधक गोलियां भी आईं जिसने सबकुछ बदल दिया. मारग्रेट सेंगर के 50 सालों के अथक प्रयासों से 1965 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने गर्भनिरोधक को क़ानूनी मान्यता दी. गर्भनिरोधक गोलियां या डिवाइस ने महिलाओं को यह नियंत्रण दिया कि वे कब मां बने और कब नहीं. यदि उसके करियर के एक मुकाम पर जाकर ही उसे परिवार आगे बढ़ाना होता है तो वह अब यह कर सकती है. अब महिलाएं अधिकतम दो या तीन बार ही मां बनती हैं इसका सीधा-सा अर्थ हुआ कि उन्हें बच्चों की परवरिश पर अब पहले की महिलाओं के मुकाबले 5 से 6 गुना कम समय देना पड़ रहा है. क्या यह बहुत क्रांतिकारी नहीं था उनके लिए? हां, था. यही वह मोड़ था जहां से महिलाएं शिक्षा, राजनीति, व्यापार में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना शुरू हुईं.

बराबरी के आंदोलन का दौर
1970 के दशक में ही महिलाओं ने अमेरिका में बराबरी के लिए आंदोलन छेड़ा. उन्हें लग रहा था कि पुरुषों की तरक़्क़ी के अब तक के सोपान वो शहद थी जिसमें उन तितलियों के पंख चिपका दिए गए थे. अब वे उड़ना चाहती थी. अपने पंखों पर इठलाना चाहती थी. अब वे केवल अपनी पहचान मां, पत्नी और बेटी के रूप में नहीं चाहती थी. वे ख़ुद की पहचान बनाना चाहती थी.
1963 में आई बेट्टी फ्रीडेन की किताब ‘द फ़ेमिनाइन मिस्टिक’ ने वह शोला भड़काया नारीवादी आंदोलन का कि फिर ये नहीं बुझा. यह किताब आते ही इंटरनैशनल बेस्टसेलर बन गई और जिसने भी इसे पढ़ा वह आंदोलन में शामिल हो गया. एक लेखक द्वारा ज़माने को बदल देने का बेट्टी एक बेहतरीन उदाहरण हैं. किताबें क्रांति लाती हैं. बेट्टी का उदाहरण बताता है कि हिटलर ग़लत था जो कहता था कि क्रांति अच्छे लेखक से नहीं अच्छे वक्ता से आती है.

कमान स्त्री के हाथ, लेकिन क्या स्त्री को सही मायने में मिली बराबरी?
श्रीलंका की चंद्रिका कुमारतुंगा से फ़ीमेल लीडरशिप शुरू हुई. फिर भारत की इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनकर 50 करोड़ लोगों का नेतृत्व करके विश्व की महिलाओं को दिशा और हौंसला दोनों दिया. दुर्भाग्य से अमेरिका से शुरू हुआ आंदोलन अब तक अपने देश की महिला को देश के सर्वोच्च पद पर नहीं बैठा पाया है. हमारे देश के भी कुछ विचारकों ने नारीवाद को एक नई और बड़ी मुसीबत बताया था लेकिन फिर भी इंदिरा गांधी के बाद सोनिया गांधी के नेतृत्व में दो बार उनकी पार्टी ने सरकार बनाई. जिसमें वे सबसे शक्तिशाली व्यक्ति की भूमिका में थी.
सच कहूं तो बराबरी नारियों को अब भी नहीं मिली है. 1970 के दशक तक उन्हें एक जैसे कार्य की पुरुषों की तुलना में 40% कम पगार मिलती थी वह आज 20% कम पर है बस. बराबर नहीं है. यह मैं अमेरिका जैसे विकसित और महिलावाद के अगुआ देश की बात कर रहा हूं विकासशील और पिछड़े देशों के तो फिर कहने ही क्या. हमारे देश के किसी ठेकेदार से आप पूछेंगे कि मज़दूरों को क्या पगार दोगे तो वह फौरन कहेगा आदमी 500 रुपए रोज़ और औरत 300 रुपए रोज़.

कोरोना के बाद क्या बदलनेवाला है?
जैसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति बदली थी वैसी ही स्थिति अब कोरोना के बाद बदलने वाली है. वर्क फ्रॉम होम कल्चर एक बड़ा बदलाव लेकर आने वाला है. ट्विटर के सीईओ ने तो ऐलान कर दिया है कि उनके एम्प्लाइज जब तक चाहें तब तक वर्क फ्रॉम होम कर सकते हैं. जब घर से ही काम किया जाने लगेगा तो कई महिलाएं इसमें पुरुषों को कड़ी चुनौती देंगी और कई उनसे आगे निकल जाएंगी. वर्क फ्रॉम होम महिलाओं के लिए एक सौगात लेकर आया है ख़ुद को साबित करने की. पुरुषों के बराबर होने की या उनसे भी आगे निकल जाने की. इससे गांव या क़स्बों की प्रतिभाशाली युवतियां किसी मेट्रो में स्थित कम्पनी के लिए काम कर सकती हैं या उनके प्रोजेक्ट का हिस्सा बन सकती हैं.
सबके चेहरों पर पर नक़ाब है. पुरुषों के भी और महिलाओं के भी. नारीवादी आंदोलन की एक मांग यह भी थी कि सभी महिलाएं सुंदर हैं. उन्होंने ब्रा, लिपिस्टिक, सैंडिल्स, ज्वेलरी को पुरुषों की ग़ुलामी का प्रतीक माना था और उनकी होली जलाई थी. लेकिन बाद में यह कहीं पीछे छूट गई. अब भी कहीं कहीं ऐसे आंदोलन करती युवतियां दिख जाती हैं. लेकिन कोरोना में सबके चेहरे ढंके हुए हैं तो सभी महिलाएं एक समान हो गई हैं. अब कम सुंदर होने के कारण उन्हें कम अवसर मिलेंगे या कम आंका जाएगा ऐसा नहीं है. यह ख़ूबसूरत फ़िल्म हिडन फ़िगर की पात्रों की तरह बहुत योग्य हैं और अपने हक़ के लिए लड़ना और बोलना जानती हैं.