लालू के 3 साल के बेटे को गिफ्ट में 13 एकड़ जमीन: जिसने दी थी, उनके मंत्री पति को दिनदहाड़े AK-47 से भून दिया

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बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के बाद रमा देवी ने उनकी विरासत को संभाला

आपने रमा देवी का नाम सुना होगा। उन्हें संसद में पीठ पर आसीन भी देखा होगा। वो बिहार के दिवंगत राजद नेता बृजबिहारी प्रसाद की पत्नी हैं। बृजबिहारी प्रसाद की हत्या हो गई थी। हाल ही में रमा देवी ने बयान दिया है कि लालू यादव का शासनकाल जंगलराज था और उसी दौरान उनके पति की हत्या हुई। भाजपा के टिकट पर शिवहर लोकसभा क्षेत्र से जीत की हैट्रिक लगा चुकीं रमा देवी ने ये बयान उस सरकार के बारे में दिया, जिसमें खुद उनके पति मंत्री थे।

रमा देवी ने हाल ही में कहा कि लालू राज में गरीब-गुरबा समाज पर जुल्म हो रहा था। कहीं पर किसी के दुकान से कुछ भी उठाकर चल देना, रंगदारी नहीं देने पर मारपीट करना आम बात थी। पुलिस भी शिकायत सुनने को तैयार नहीं थी। लेकिन अब सुशासन है, किसी पर कोई दबंगई नहीं कर सकता है। उन्होंने जनता से कहा कि अब पुलिस से ऑनलाइन शिकायत की सुविधा है। हर जगह कानून का राज है।

रमा देवी ने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि उस राज में ही उनके पति की हत्या कर दी गई, इसलिए वो अपने समाज के लोगों से कहेंगी कि जिस तरह से कानून का राज व विकास हो रहा, इसके लिए अपना एक-एक वोट राजग को दें। दरअसल, जून 13, 1998 में हुई बृजबिहार प्रसाद की हत्या बिहार में पहली ऐसी वारदात थी, जब सरेआम किसी मंत्री को ही मार डाला गया। और हाँ, वो भी दिनदहाड़े।

दरअसल, ये वो दौर था जब मुजफ्फरपुर में लंगट सिंह कॉलेज और मुजफ्फरपुर इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से छात्र की जगह अपराधी निकलते थे। बृजबिहारी प्रसाद पिछड़ों व दलितों की राजनीति करते थे और इसीलिए उनका वोट बैंक काफी कम समय में ही मजबूत हो गया था। हाजीपुर से लेकर चम्पारण तक उन्होंने राजद को मजबूत किया था। वो इंजीनियरिंग छात्र थे, इसीलिए मंत्रालय भी इसी से सम्बंधित मिला।

बृजबिहारी प्रसाद को वैश्य समाज का बड़ा नेता माना जाता था। यही कारण है कि उनकी जयंती और पुण्यतिथि पर अब भी वैश्य समाज के लोग उन्हें याद करते हैं और उनके लिए श्रद्धांजलि सभा का आयोजन करते हैं। उनकी पत्नी रमा देवी शिवहर से जीत की हैट्रिक लगाने से पहले 90 के दशक के अंत में मोतिहारी से भी सांसद रह चुकी हैं। इससे आपको अंदाज़ा लग सकता है कि बृजबिहारी प्रसाद का वर्चस्व कैसा रहा होगा।

दरअसल, वो खुद भी आपराधिक प्रवृत्ति के थे और उन पर कई मामले दर्ज थे। ‘बिहार पीपल्स पार्टी’ के नेता छोटन शुक्ला हत्याकांड में उनका नाम आया था और उनके भाई भुटकुन शुक्ला की हत्या मामले में भी साजिशकर्ता के रूप में उनका ही नाम सामने आया था। लालू यादव की सरकार में वो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय पाने में सफल रहे और इसके साथ ही अपनी आपराधिक छवि को सियासी आवरण देने में वो कामयाब हुए।

इसके बाद उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। तकनीकी संस्थानों में भर्तियों और एडमिशन में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियाँ हुईं और इन सबके पीछे उनका नाम सामने आया। लालू यादव को अपनी सरकार की छवि बचानी थी और साथ ही अपनी पार्टी में जमे आपराधिक छवि के बाहुबलियों को नाराज़ भी नहीं करना था, इसीलिए उन्होंने बृजबिहारी प्रसाद को इस्तीफा देने को कहा। इसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया।

बिहार में उस समय अगर कुछ ऐसी जगहें थीं, जो सबसे ज्यादा आरामदेह हों, तो उनमें बिहार की जेलों का नाम सबसे ऊपर आता है। अपराधी बड़े ही ठाठ से जेलों में बैठ कर अपनी करतूतों को अंजाम देते थे। वहाँ उन्हें लैंडलाइन (बाद में मोबाइल फोन) से लेकर टीवी और बिस्तर सहित कई सुविधाएँ नसीब होती थीं। बृजबिहारी प्रसाद भी कुछ दिन जेल में रहे और फिर वो एक अस्पताल में भर्ती हो गए।

बिहार में एक समय था, जब बृजबिहारी प्रसाद और छोटन शुक्ला के गैंगों के बीच संघर्ष का दौर चलता था। छोटन शुक्ला भी राजनीति में कदम रख रहे थे और इससे पहले कि पूर्वी चम्पारण के केसरिया विधानसभा क्षेत्र से उनका विधायक बनने का स्वप्न पूरा होता, उन्हें चुनाव प्रचार कर के लौटते समय ही मार डाला गया। दिसंबर 4, 1994 को ये घटना हुई। इसके साढ़े 3 वर्षों बाद बृजबिहारी प्रसाद को मार कर बदला लिया गया।

लेकिन, इन सबके बीच बिहार में गैंगवार का वो दौर चला, जिसने जनता की नींद हराम कर दी। छोटन शुक्ला को रघुनाथ पांडेय का समर्थन प्राप्त था, जो मुजफ्फरपुर से विधायक चुने जाते थे और उन्हें पूरा जिला ‘बाबा’ कह कर पुकारता था। उस वक़्त लालू यादव का राजनीतिक कद बढ़ता जा रहा था और इसके साथ ही बिहार में अगड़े-पिछड़े की लड़ाई भी जोर पकड़ रही थी। छोटन शुक्ला और बृजबिहारी प्रसाद के संघर्ष को भी भूमिहार बनाम बनिया के रूप में देखा जाने लगा था।

बृजबिहारी प्रसाद ने जेल में सीने में दर्द की शिकायत की थी, जिसके बाद उन्हें पुलिस ने पटना के इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया था। लालू यादव का करीबी माने जाने के कारण अस्पताल में उनकी सुरक्षा के लिए पुख्ते इंतजाम किए गए थे। लेकिन, छोटन शुक्ला की हत्या के बाद से उनकी तरफ के लोग मौके के इन्तजार में थे और उनके दिल की आग अभी तक ठंडी नहीं हुई थी।

छोटन शुक्ला के करीबियों ने बृजबिहारी प्रसाद को अस्पताल में ही मार डालने की साजिश रची और इसके लिए उत्तर प्रदेश के कुख्यात अपराधी और शूटर श्रीप्रकाश शुक्ल की मदद ली गई। वो एक ऐसा शूटर था, जिसकी तलाश कई राज्यों की पुलिस को थी। उसने अस्पताल परिसर में ही बृजबिहारी प्रसाद को एके-47 से छलनी कर दिया। हालाँकि, बाद में श्रीप्रकाश शुक्ल भी एक पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था।

बृजबिहारी प्रसाद की हत्या के बाद उनकी पत्नी रमा देवी सियासी मैदान में उतरीं और अपने पति की राजनीतिक विरासत को संभाला। इसमें वो काफी सफल भी हुईं। 1998 में राजद ने उन्हें मोतिहारी से टिकट दिया और उन्होंने जीत दर्ज की। 2005 में लालू यादव युग समाप्त होने के साथ ही उन्होंने भाजपा का दामन थामा और वो अब लगातार 3 चुनाव जीत कर 11 सालों से सांसद हैं। उन्हें राज्य में भाजपा का बड़ा ओबीसी चेहरा माना जाता है

ऐसा नहीं है कि उन्हें कभी हार का मुँह नहीं देखना पड़ा। 1999 लोकसभा चुनावों में उन्हें हार मिली, लेकिन इसके अगले ही साल उन्होंने विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर के राबड़ी देवी की सरकार में मंत्रीपद प्राप्त किया। वो इस सरकार में लोक निर्माण मंत्री बनी थीं। उनके पति बृजबिहारी प्रसाद गंगा पार के लालू यादव के सबसे पसंदीदा नेता थे और 1, अणे मार्ग में उनकी बेरोकटोक एंट्री होती थी, जिससे उनके रसूख का अंदाज़ा लगता है।

निचली अदालत ने इस हत्याकांड के मामले में आरोपितों को दोषी भी ठहराया, लेकिन पटना हाईकोर्ट ने जुलाई 2014 में सभी 8 आरोपितों को बरी कर दिया। पूर्व सांसद सूरजभान सिंह, पूर्व विधायक मुन्ना शुक्ला और राजन तिवारी समेत आठ लोगों को बरी कर दिया गया। आज सूरजभान सिंह दूसरे मामलों में जेल में हैं। राजन तिवारी और मुन्ना शुक्ला बिहार चुनाव में किस्मत आजमा रहे हैं। सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी भी मुंगेर से सांसद रही हैं।

हाईकोर्ट का कहना था कि सीबीआई यह साबित नहीं कर पाई कि इन अभियुक्तों ने मंत्री की हत्या की साजिश रची थी। बकौल हाईकोर्ट, सीबीआई ऐसा कोई साक्ष्य भी पेश नहीं कर पाई, जिससे यह साबित होता हो कि इन अभियुक्तों ने ही घटना को अंजाम दिया था। हाईकोर्ट ने पाया कि जाँच एजेंसी ने जिन साक्ष्यों के आधार पर इन अभियुक्तों को हत्याकांड से जोड़ने का प्रयास किया है, उसमें कोई दम नहीं है। इस हत्याकांड की जाँच बिहार पुलिस कर रही थी, लेकिन बाद में सीबीआई को सौंप दी गई थी।

जबकि इसी मामले में इन सभी आठों आरोपितों को निचली अदालत ने अगस्त 2009 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। साथ ही इन सभी पर 20,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया था। आरोपित शशि कुमार राय को दो साल कैद और 10,000 रुपए जुर्माना लगाया था। बता दें कि जब प्रसाद की हत्या हुई थी, तब शाम का समय था और वो अपने बॉडीगार्ड्स के साथ अस्पताल परिसर में ही टहल रहे थे। तभी गाड़ी से आए आरोपितों ने उन्हें भून दिया था।

2017 में बिहार भाजपा के बड़े नेता और मौजूदा उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने लालू परिवार से रमा देवी के करीबी रिश्तों का खुलासा करते हुए आरोप लगाया था कि 23 मार्च 1992 को रमा देवी ने लालू यादव के दोनों बेटों के नाम 13 एकड़ जमीन गिफ्ट की थी। यह जमीन मुजफ्फरपुर के किशनगंज मौजा इलाके में स्थित है। हालाँकि, रमा देवी ने भी इसे स्वीकार किया था कि अपने पति के कहने पर उन्होंने यह उपहार दिया था।

जानने वाली बात ये भी है कि तब तेज प्रताप यादव की उम्र महज 3 साल ही थी। गिफ्ट के दस्तावेज में लिखा गया था कि हालाँकि तेज प्रताप नाबालिग हैं लेकिन वो रमा देवी का यथासंभव ख्याल रखता है, रमा देवी ने उसके बर्ताव से खुश होकर उसे उपहार में जमीन देने का फैसला किया। ऐसे अजीबोगरीब कारनामे लालू यादव के राज में आम थे। बाद में रमा देवी ने बताया कि उन्हें बताया गया था कि लालू को ये जमीन देने से गाँव का विकास होगा।

रमा देवी ने न सिर्फ राजनीति, बल्कि आपराधिक मामलों में भी अपने पति की विरासत को संभाला है। उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में स्वीकार किया था कि उन पर 6 मुक़दमे ऐसे चल रहे हैं, जिन पर अदालत संज्ञान ले चुकी है। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी वो चर्चा में आई थीं, जब मतदान से ठीक एक दिन पहले उनके दफ्तर से 4 लाख 11 हजार रुपए बरामद किए गए थे। अब वो संसद में भी खासी सक्रिय रहती हैं।

25 जुलाई को लोकसभा में ट्रिपल तलाक बिल पर पर चर्चा के दौरान सदन की अध्यक्षता कर रहीं बीजेपी सांसद रमा देवी पर सपा नेता आज़म ख़ान ने अभद्र टिप्पणी की थी। उन्होंने रमा देवी से कहा था, “आप मुझे इतनी अच्छी लगती हैं कि मेरा मन करता है कि आपकी आँखों में आँखें डाले रहूॅं।” इस तरह की टिप्पणी से अध्यक्षता कर रहीं सांसद थोड़ी देर के लिए असहज हो गई थीं। आज़म ख़ान की इस भद्दी टिप्पणी से उनकी किरकिरी होनी तय थी, जो हुई भी।

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