राज्यपाल और सीएम के बीच वार-पलटवार के बाद महाराष्ट्र की सियासत में उबाल

राज्यपाल और सीएम के बीच वार-पलटवार के बाद महाराष्ट्र की सियासत में उबाल

लगता है देश में तिल को ताड़ बनाने का सिलसिला ही चल निकला है.कोरोना की महामारी अभी खत्म नहीं हुई है.त्योहारों के सीजन में देश से अनुशासन बरतने की अपील की जा रही है.

लेकिन महाराष्ट्र में इस बात पर बवाल मचा है कि मंदिर क्यों नहीं खोले जा रहे हैं. बीजेपी ने आज इस मुद्दे पर पूरे प्रदेश में प्रदर्शन किया.लेकिन इस प्रकरण में जो कुछ हुआ उसका सबसे अहम पहलू है मुख्यमंत्री को राज्यपाल की ओर से भेजी गई चिट्ठी.

जिसमें राज्यपाल ने मुख्यमंत्री की विचारधारा पर तंज कसा है. जब भी कोई राज्यपाल बनता है और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के सामने शपथ लेता है तो कहता है कि-

”मैं ईश्वर की शपथ लेता हूं.. मैं अपनी पूरी योग्यता और निष्ठा से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करूंगा.”

यानी संविधान के आर्टिकल 159 में ये कहा गया है कि एक राज्यपाल से संविधान और कानून के तहत काम करने की अपेक्षा की जाती है. लेकिन सबसे पहले ये रिपोर्ट पढ़िए और राज्यपाल की उस चिट्ठी को समझिए. आरोप लग रहा है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे भगत सिंह कोश्यारी पार्टी से निष्ठा दिखा रहे हैं ना कि संविधान से.

मुंबई के मशहूर सिद्धिविनायक मंदिर में भजन गूंजने चाहिए थे घंटे बजने चाहिए थे वहां पर प्रदर्शन हो रहा है. शिरडी में साईं के दर पर भी भक्त धरने पर बैठे हैं, और इनमें जो कॉमन बात है वो ये कि ये सारे तीर्थ महाराष्ट्र में हैं. और प्रदर्शन करने वाले बीजेपी के कार्यकर्ता हैं.

इस पूरे प्रदर्शन के बीच जो कॉमन बात नहीं है वो है महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की चिट्ठी. जिसे लेकर महाराष्ट्र सरकार और राज्यपाल में ठनी हुई है.

राज्यपाल ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एक खत लिखा है और राज्य के मंदिरों को खोलने की नसीहत दी है.लेकिन जिस अंदाज में नसीहत दी गई है वो महाराष्ट्र सरकार को चुभ गई.राज्यपाल ने लिखा है कि

उद्धव को राज्यपाल की चिट्ठी
आप हिंदुत्व के सशक्त पैरोकार रहे हैं, और मुख्यमंत्री बनने के बाद अयोध्या जाकर श्रीराम के प्रति अपने समर्पण को भी सार्वजनिक किया. आप अषाढ़ी एकादशी को पंढरपुर के विट्ठल रुक्मिणी मंदिर गए और पूजा की. मुझे हैरानी है कि आप धर्मस्थलों का खोलना क्यों टालते जा रहे हैं.क्या कोई ऐसा देव आदेश आपको मिला है, या फिर आप अचानक ‘सेक्युलर’ हो गए हैं, जिस शब्द से आपको नफरत थी?

सटीक निशाने पर लगा राज्यपाल का ये तंज

राज्यपाल का ये तंज सटीक निशाने पर बैठा जो एनडीए छोड़कर कांग्रेस और एनसीपी के सहयोग से सरकार चला रहे उद्धव को चुभना ही था.उद्धव ने पलटवार करते हुए कहा कि-जिस तरह से एकदम से लॉकडाउन लगाना उचित नहीं था उसी तरह से उसे पूरी तरह से समाप्त करना भी ठीक नहीं है.हां, मैं हिंदुत्व का अनुसरण करता हूं और मेरे हिंदुत्व को आपकी पुष्टि की जरूरत नहीं है.

महामहिम के पद की गरिमा पर उठने लगे सवाल

अब सवाल महामहिम के पद की गरिमा का उठने लगा है.आरोप लग रहे हैं कि मंदिर खोलने के लिए लिखी गई चिट्ठी में एक राज्यपाल पर पार्टी की निष्ठा हावी होती दिख रही है. और वो राज्य के फैसलों पर वैसी ही प्रतिक्रिया दे रहे हैं जैसी प्रतिक्रिया आम तौर पर पार्टियां दिया करती हैं. उनके बयान पर पार्टी के कार्यकर्ता जुट रहे हैं. भगवान पर सियासत हो रही है. जो कोरोना काल में सोशल डिस्टेंसिंग तोड़ रहे हैं.

मुद्दा मंदिर का नहीं बल्कि धर्मस्थलों का है

पहली बात तो ये कि ये मुद्दा मंदिर का नहीं बल्कि धर्मस्थलों का है. और किसी भी सरकार के दो ही फैसले हो सकते हैं. या तो धर्मस्थल खोल दिए जाएं, या फिर ना खोले जाएं.अगर महाराष्ट्र सरकार इस पर कोई फैसला लेती है तो ये उसका अधिकार है.

इस फैसले का विरोध भी हो सकता है. सरकार के फैसले को जनता या पार्टियां सही या गलत ठहरा सकती हैं.लेकिन एक राज्यपाल ने जब अपनी सरकार पर तंज कसा तो ये बात मुख्यमंत्री के गले नहीं उतरी. और महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री और राज्यपाल में ठन गई.