फिल्मी चकाचौंध को छोड़, सुकून की तलाश में भटकती रहीं एक्ट्रेस, सत्य की खोज में बन गई संन्यासी

फिल्मी चमक-दमक छोड़कर बीच में संन्यासी हो गई थीं शशिकला

-दिनेश ठाकुर

शशिकला नहीं रहीं। हिन्दी सिनेमा के बीते दौर का एक और सितारा बुझ गया। उन्हें याद करते हुए कई शोख, चंचल, बिंदास और चंट-चालाक किरदार आंखों में घूम जाते हैं, जो उन्होंने फिल्मों में सलीके से अदा किए। चाहे वह अंगुली में चाबी का छल्ला घुमाते हुए आंखें नचाने वाली ‘गुमराह’ की सेक्रेट्री का किरदार हो या ‘सुजाता’ की बात-बात में खिलखिलाती युवती का किरदार, जो ‘बचपन के दिन भी क्या दिन थे’ गाते हुए दुखों में डूबी नायिका (नूतन) के चेहरे पर भी हंसी खिला देती है। एक जमाने में शशिकला सितारा-हैसियत रखती थीं। कई सदाबहार गीत उनके नाम के साथ वाबस्ता हैं। धर्मेंद्र की पहली कामयाब फिल्म ‘फूल और पत्थर’ में दो नृत्य-गीत ‘जिंदगी में प्यार करना सीख ले/ जिसको जीना है, मरना सीख ले’ और ‘शीशे से पी या पैमाने से पी’ शशिकला पर फिल्माए गए। धर्मेंद्र की ही धीर-गंभीर ‘अनुपमा’ में ‘भीगी-भीगी फिजा, सन सन सनके जिया’ पर झूमते हुए उन्होंने माहौल में अलग रंग घोले। शम्मी कपूर की ‘जंगली’ में कड़क मां (ललिता पवार) के डर से शशिकला का सैंडिल उठाकर चुपचाप नंगे पैर घर से निकलना और अनूप कुमार के साथ ‘नैन तुम्हारे मजेदार’ पर नाचना-कूदना भी उस जमाने के लोगों को याद होगा।

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पर्दे पर कई रंग बिखेरे
एक जमाना था, जब दर्शक शशिकला की अदाकारी पर फिदा थे, दौलत और शोहरत शशिकला पर। नायिका से सह-नायिका और फिर चरित्र अभिनेत्री के रूप में उन्होंने पर्दे पर कई रंग बिखेरे। वी. शांताराम की ‘सुरंग’ में गड़बड़ाए मानसिक संतुलन वाली युवती के किरदार को उन्होंने अलग गहराई दी। तरुण मजुमदार की ‘राहगीर’ में भी उनका किरदार काफी हटकर था। ‘आरती’ में उनका खलनायिका का रूप लोगों को इतना भाया कि बाद की कई फिल्मों में इसे दोहराया गया। ‘आई मिलन की बेला’, ‘अनपढ़’, ‘हरियाली और रास्ता’, ‘नील कमल’ आदि उनकी यादगार फिल्में हैं। फणि मजुमदार की ‘आरती’ और बी.आर. चोपड़ा की ‘गुमराह’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड (सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री) से नवाजा गया।

इतनी खुशी दे दी कि घबराता है दिल…
‘अनुपमा’ में शशिकला पर एक गीत फिल्माया गया, ‘क्यों मुझे इतनी खुशी दे दी कि घबराता है दिल।’ यह एकदम अछूता ख्याल है कि किसी को खुशी से घबराहट होने लगे। शशिकला की जिंदगी में भी ऐसा मोड़ आया। फिल्मी चमक-दमक उनकी बेचैनी बढ़ाने लगी। सत्तर के दशक में वह अचानक इस चमक-दमक को छोड़कर सुकून की तलाश में भटकती रहीं। चार-पांच साल भटकने के दौरान उन्होंने जिंदगी का यह मंत्र हासिल किया कि सच्ची खुशी ‘बटोरने’ में नहीं, ‘बांटने’ में है।

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कई टीवी धारावाहिकों में भी नजर आईं
हर कलाकार को उसकी लोकप्रियता के हिसाब से पूजने वाली फिल्म इंडस्ट्री से उस दौर में इस तरह की बातें भी उड़ीं कि शशिकला शोहरत को हजम नहीं कर सकीं, इसलिए संन्यासी हो गई हैं। शशिकला ने इन बातों की परवाह नहीं की। सच की खोज में उन्होंने कभी हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी, बौधगया में साधु-संतों के साथ वक्त बिताया, कभी विदेशी धार्मिक स्थलों में घूमीं, तो कभी मदर टेरेसा के आश्रम में अपाहिजों की सेवा की। बाद में बदली हुई शशिकला की फिल्मों में वापसी हुई। फिल्मों के अलावा ‘जीना इसी का नाम है’, ‘अपनापन’, ‘दिल देके देखो’, ‘सोन परी’ आदि टीवी धारावाहिक भी उनकी अदाकारी से धन्य हुए।


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